जन्म के बाद – बच्चों में विकास।

बच्चों में विकास:

जन्म के बाद ही बच्चों में शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक, सामाजिक, संविदात्मक और क्रियात्मक विकास आरंभ हो जाता है।

परंतु जन्म के बाद बच्चों के लिए यह संसार अंजाना होता है। वह केवल अपनी मां की आवाज पहचानते हैं इसलिए बच्चों को जन्म के बाद प्यार और स्नेहबद्ध आलिंगन की आवश्यकता होती है। मां की आवाज और मां का साथ बच्चों के अंदर एक सुरक्षा की भावना लाता है। इसलिए जितना हो सके उतना ज्यादा उस बच्चे को मां का प्यार मिलना चाहिए। यह बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए अति आवश्यक होता है।

जन्म के बाद बच्चे रो कर ही अपनी जरूरतें दर्शाते हैं। वह भूख लगने पर, गीला होने पर या किसी अन्य समस्या होने पर रोते हैं। इसलिए मां को अपने बच्चे की जरूरत को तुरंत दूर करना चाहिए। ऐसा करने पर बच्चों के अंदर सुरक्षा की भावना आ जाती है कि उनकी जरूरतें इस संसार में कोई पूरी कर रहा है।

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जन्म के बाद बच्चे ज्यादातर समय सोते रहते हैं और वह जब तभी जागते हैं जब उन्हें भूख लगी हुई  होती  है।  पर कभी-कभी वह भूख लगने पर भी नहीं जागते हैं तो यह  मां की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को हर दो-तीन घंटे बाद जगा कर फीड करा दे। अगर किसी कारणवश बच्चों का रोना समझ न आ रहा हो तो चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए।

साधारणतया यह देखा गया है कि जब बच्चे छोटे होते हैं तो उनके मां-बाप और परिवार के सदस्य बच्चे से बातें करते हैं। और बातें करते समय यह देख कर आश्चर्य होता है कि बच्चे भी उन बातों का रिस्पांस देते हैं। यह बातचीत बच्चों के विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। इस तरह से बातचीत करना बच्चों में बौद्धिक विकास पर बहुत पॉजिटिव प्रभाव डालता है। बच्चों के अंदर सोचने समझने की क्षमता तेजी से बढ़ती है। उनके अंदर भावनाओं का ज्ञान शुरू हो जाता है, और धीरे-धीरे उनको भाषा का ज्ञान भी हो जाता है।

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अगर हम ध्यान देंगे तो हम देखेंगे कि बच्चे अपनी बात को कई तरीके से प्रतिक्रिया देकर व्यक्त करते हैं। जैसे वह खुश होने पर हंसते हैं और कभी-कभी बहुत जोर से  ताली बजाकर खिल खिलाकर हंसते हैं। कुछ परेशानी होने पर चेहरे पर परेशानी का भाव आ जाता है। उनको कुछ चाहिए होता है तो उनके भाव दूसरे होते हैं और वह संकेत करके उस चीज को पाने की इच्छा व्यक्त करते हैं।

कुछ ही महीनों के बाद बच्चे अपने संकेत या हरकतों से प्रतिक्रिया देना शुरू कर देते हैं। एक साल के होते-होते बच्चे बैठना, चलना, दौड़ना, चीजों को पकड़ना यह सब सीख जाते  हैं।

बच्चों का विकास पांच साल की उम्र तक सबसे तेजी से होता है। पांच साल की उम्र के बच्चों में शारीरिक, बौद्धिक, भावनात्मक, व्यवहारिक आदि क्षेत्रों में जीवन के विकास की नींव पड़ जाती है।  इसलिए इस अवस्था में बच्चों पर उनके अभिभावक, परिवार के सदस्य और फ्रेंड्स आदि के साथ के रिश्ते का अत्यधिक महत्व होता है।

चुकीं बच्चे सबसे ज्यादा अपनी मां के साथ रहते हैं तो मां का अपने बच्चों के साथ व्यवहार और रिश्ते का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है। यह प्रभाव केवल मां और बच्चे का ही नहीं बल्कि मां का अपने जीवन साथी के साथ कैसा है, उसके परिवार के अन्य सदस्यों के साथ कैसा है, और लोगों के साथ कैसा है, परिवार के सदस्यों का आपस में कैसा व्यवहार है, इन सबका असर बच्चे के विकास पर पड़ता है।

इसलिए यह आवश्यक है कि अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करना है और कैसा रिश्ता रखना है, इसके बारे में उन्हें अच्छी तरह से जानकारी हो।

इसलिए कुछ बातें जो ध्यान में रखनी है वह निम्न प्रकार हैं:

१ बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए अभिभावकों को सबसे पहले उनके स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। यह ध्यान दें कि उनके खाने में सभी प्रकार के  विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और न्यूट्रिएंट्स सम्मिलित हो। और जैसा डॉक्टर बताते हैं वैसी डाइट बच्चों को जरुर दे। उनमें बचपन से ही अच्छे खाने की आदत डालने से वह बाद में भी अपने खाने का ध्यान रखते हैं।

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समय-समय पर उनको विभिन्न खाने की चीजों के क्या फायदे होते हैं वह भी बच्चों की समझ के अनुसार अभिभावकों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि उन्हें अच्छा खाना खाने का महत्व पता चले। और वह जीवन भर अच्छे खाने के महत्व को ध्यान रखते हुए अपनी डाइट ठीक रखें।

२ बच्चों के विकास में खेल का बहुत महत्व है। खेल से ना केवल उनका स्वास्थ्य अच्छा होता है, बल्कि उनका शारीरिक, बौद्धिक और मानसिक विकास भी होता है। खेलने से बच्चों के अंदर अनुशासन, दूसरों के साथ सामंजस्य का भाव रखना और दोस्ती करना आता है।

जो अभिभावक खुद भी खेल में रुचि रखते हैं उनके बच्चों को भी सामान्यतः खेल में रुचि होती है। बच्चों के साथ खेलने से अभिभावक और बच्चों के बीच में अच्छा सकारात्मक रिश्ता बनता है।

 

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३ अभिभावकों का अपने बच्चों के साथ बातचीत करने से अच्छा रिश्ता कायम होता है। यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों के साथ बातचीत करते समय आपका पूरा ध्यान बच्चों पर ही हो। इससे बच्चों में यह भावना आती है कि आप उनके साथ खुश रहते हैं और आप उनकी केयर करते हैं। जिस समय आप बच्चों के साथ हैं उनको पूरी तरीके से स्वीकार करिए। हर समय उनको कोई ना कोई दिशा निर्देश मत दीजिए।

अगर बच्चा कुछ गलत बात भी कह रहा है तो हर समय उसको सही मत करिए। बच्चों के व्यवहार के अनुसार ही उनसे वैसी बात करनी चाहिए। कभी-कभी बच्चों का मूड कुछ और होता है और हम उसको कुछ और बोलते हैं। इसलिए यह जानने की कोशिश करें कि बच्चा क्या कहना चाह रहे हैं और आपसे किस तरह की बात करना चाह रहा है।

बच्चों की भावनाओं को समझने के लिए उनको रुचि से सुनिए और उनको अपनी पूरी बात कहने के लिए प्रोत्साहित करें।

बच्चों की बात को रूचि से सुनने और प्रोत्साहित करने से बच्चों के साथ आपका रिश्ता बहुत मजबूत बन जाता है।

४ अपने बच्चों के साथ आपसी सम्मान, भरोसा और ध्यान रखने वाला संबंध बनाएं। बच्चे को जब भी जरूरत हो तो आप उसके साथ खड़े रहे। उसकी पुकार को समझें और सुने तो वह बच्चा भी आपके ऊपर वैसे ही भरोसा करेगा और वैसे ही प्रतिक्रिया भी करेगा जैसा आप उसके साथ कर रहे हैं। अगर छोटा बच्चा कभी गिर जाए तो आप उसको उठाने के लिए आगे बढ़े। अगर वह किसी कारणवश रो रहा हो तो उसको दुलार करके उसके रोने का कारण समझे।

बच्चा स्कूल जाने लगा हो और अगर स्कूल में उसकी कोई समस्या है तो उसका समाधान तुरंत करें। ऐसे में बच्चे अपने मां बाप के ऊपर पूरी तरह से आश्वस्त रहते हैं कि वह उनका हर हाल में ध्यान रखेंगे।

To be continued..

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