पेरेंटिंग टिप्स # जीवन में असफलताओं का सामना करने के लिए बच्चों को कैसे तैयार किया जाए

 क्या आप इस आवश्यक पेरेंटिंग टिप को खो रहे हैं- असफलता का सामना करना?

पेरेंट्स! क्या आपने कभी अपने बच्चों को जीवन में असफलताओं और निराशा का सामना कराने की तैयारी करने का सोचा है?

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यदि आपका उत्तर ‘कभी नहीं’ है, तो,

क्या आप जानते हैं कि बच्चों को सफलता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करने से अधिक महत्वपूर्ण असफलताओं का सामना करना सिखाना है? माता-पिता हमेशा अपने बच्चों को सफलता पाने के लिए कड़ी मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और हमेशा बच्चों को सफलता का महत्व सिखाते हैं, जो ठीक है और जिसे सिखाया जाना चाहिए, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण है  बच्चों को विफलताओं का सामना करना सीखना क्योंकि यह जीवन का सत्य है। जीवन की सच्चाई यह है कि कोई भी हमेशा सफलता प्राप्त नहीं करता है।

हम इस बात को भूल जाते हैं।

कभी-कभी हम समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में पढ़ते हैं कि कुछ बच्चों ने तमाम विषम परिस्थितियों में रहकर भी कैसे अपने आप को एक सफल व्यक्ति के रूप में स्थापित किया। वहीं कुछ बच्चे सब कुछ होते हुए भी जरा सी परेशानियों का सामना करते ही टूट जाते हैं।

ऐसा क्यों होता है? आम तौर पर अभिभावकों, शिक्षकों और समाज मिलकर बच्चों पर अदृश्य तनाव डाल देते हैं। उन्हें इस बात का एहसास भी नहीं होता कि उनका कौन सा व्यवहार बच्चों पर तनाव का कारण बन रहा है। स्कूल में अध्ययन और उससे संबंधित गतिविधियों दोनों में उत्कृष्ट होने की मांग बच्चों के लिए तनावपूर्ण है। जब बच्चा उच्च वर्ग (8 वीं कक्षा से ऊपर) तक पहुंचता है, तब उसकी करियर योजना के  तहत तनाव बढ़ता है। इस चरण तक, बच्चा एक मानसिकता के साथ बढ़ता है कि सफलता प्राप्त करना उसका जीवन का आदर्श है और उसको हर हाल में सफल बनना है। विफलता को वह वह शर्म की बात के रूप में देखता है।  इसलिए, असफल होने का विचार भी उसे स्वीकार्य नहीं है। यह बात उनके दिमाग में इतनी गहरी स्थापित हो जाती  है कि वास्तविक विफलता का सामना उसके  असहनीय हो जाता है। बच्चा इतना निराश महसूस करता है कि कभी-कभी वह डिप्रेशन में चला जाता है।

जीवन में रिजेक्शन और असफलताओं का सामना करने के लिए बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाने के लिए, माता-पिता को कुछ चीजों से अवगत होना चाहिए।

माता-पिता के लिए सुझाव:

1. सफलता स्वीकार करते हैं तो विफलता भी स्वीकार करें: 

जीवन में कभी-कभी चीजें ठीक होती हैं, लेकिन कभी-कभी वे नहीं भी होती है। किसी कार्य में विफल होने का मतलब है कि आपने अपर्याप्त और गलत प्रयास किए हैं। यदि आप अपनी विफलता स्वीकार करते हैं, तो आप अगली बार सही और पर्याप्त कार्यवाही करने जा रहे हैं।इसलिए, माता-पिता को अपने बच्चों की सफलता और विफलता के बीच मतभेदों को समझाना चाहिए।

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2. उदाहरणों से दिखाएं:

हमारे पास कई किस्से होते हैं जिसमें लोग पहले अपनी प्रयासों में असफल होते हैं और फिर कड़ी मेहनत और बेहतर रणनीतियों के माध्यम से जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। लेकिन हम बच्चों के साथ ऐसी कहानियों को साझा करना भूल जाते हैं। माता-पिता को बच्चों के साथ कहानियां साझा करनी चाहिए। कभीकभी परिवारों में भी कुछ वास्तविक घटनाएं  होती हैं जिन्हें बच्चों के साथ सांझा कर सकते हैं। बच्चे उन अनुभवों को अपनी साथ जोड़ कर देखेंगे। यह सीखने का एक अच्छा तरीका है।

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3. माता-पिता को बच्चों को अपने कार्यों को स्वयं ही करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

माता-पिता की भूमिका उनके बच्चों के लिए एक समर्थक और गाइड की  होनी चाहिए। कार्यों को स्वयं पूरा करने से  आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की भावना विकसित होती है। वे विश्वास करना शुरू करते हैं कि वे स्वयं से कोई भी काम पूरा कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए जब कोई बच्चा अपने पैरों पर चलना शुरू कर देता है, तो वह इस कोशिश में कभी-कभी गिर भी जाता  है। उस समय बच्चा अभिभावकों को उसकी मदद करने के लिए देखता है। अगर माता-पिता  बच्चे के अपने प्रयास से  खड़े होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं तो इस तरह के प्रशिक्षण से बच्चों में आत्मनिर्भरता की  विकसित होती है।

कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि बच्चों को स्कूल का कोई प्रोजेक्ट का काम मिलता है, तो माता-पिता उन्हें पूरा करने में मदद करने के लिए आगे आ जाते हैं। लेकिन माता-पिता की यह मदद बच्चों की रचनात्मकता को दबा देती है।

अति संरक्षण और बहुत अधिक मार्गदर्शन से बचा जाना चाहिए। अध्ययन या अन्य गतिविधियों में समाधान देने से  बच्चे आलसी बन जाते हैं।माता-पिता को बच्चों का समर्थन करने के लिए अपनी सीमाएं जाननी चाहिए।

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4. जब  कभी बच्चा अपने प्रयासों में विफल रहा है, तो उसे निराश होने की भावनाओं का अनुभव करने दे।

उसे तुरंत प्रोत्साहित करने ना लग जाए। बच्चों को अपने माता-पिता के बिना शर्त प्यार और समर्थन की ज़रूरत है। माता-पिता की भूमिका सहायक की होनी चाहिए और उस समय बच्चों के आस-पास रहना है। बच्चों को समझने के लिए कुछ समय दें कि वास्तव में उनके साथ क्या हुआ। जब बच्चा कुछ समझने के लिए तैयार हो तो फिर विफलता के कारण का विश्लेषण करने में उनकी मदद करें।

यदि माता पिता के हर तरह के प्रयास करने के बावजूद भी बच्चा निराशा से नहीं निकल पाता तब माता पिता को अपने बच्चे को किसी प्रोफेशनल काउंसलर के पास ले जाना चाहिए।

प्रोफेशनल काउंसलर बच्चों की चिंताओं के कारण को समझकर इस बात का मार्गदर्शन कर सकता है कि बच्चों को असफलताओं का सामना कैसे करना है। वह बच्चों की निराशावादी विचारधारा को बदलकर आशावादी बना सकते हैं।

इस तरह का मार्गदर्शन हर बच्चे के पालन के लिए जरूरी है ताकि वह जीवन में किसी भी संघर्ष का सामना करने के लिए भावनात्मक रूप से मजबूत हो सके ।

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ध्यान रखें कि हर बच्चा अलग है। इसलिए, हर माता-पिता को अपने बच्चों के साथ उचित व्यवहार करना चाहिए।

ये युक्तियाँ आपको अपने बच्चे को अपना रास्ता ढूढ़ने और सफलता और विफलता दोनों की स्वीकृति सिखाने कीरणनीति  बनाने में मदद कर सकती हैं।

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